Thursday, February 26, 2015

वो ऐसा फंसा

ओह आज बड़ी भीड़ है वैसे तो रोज ही होती है, और रोज ही ज्यादा लगती है पर आज ज्यादा है :) । आज भी वही रुट था जो की रोज होता है मैं भी अपने मेट्रो स्टेशन से मेट्रो ली और निकल पड़ा अपने घर को वैसे ही रस्ते में लोगो को रीड करता हुआ क्यू की कोई दूसरा काम नहीं होता करने को और सफर भी बस एक घंटे का होता है तो अकेला मन क्या करे। अब खाली दिमाग तो शैतान का घर होता ही है और अगर ऐसे में कुछ ऐसा हो की बिलकुल ही सोचा न हो तो मज़ा आ ही जाता है ।

अब आज की ही बात ले लो वैसे तो कई खिस्से है पर ये वाला हट कर है हुआ यू की जब मेट्रो राजीव चौक पहुंची तो जैसा की होता है लोग लगे उतरने और चढ़ने और मैं भी उह्ह्ह कर के निकल ही गया पर, पर एक बंदा था दिलेर जो हिम्मत नहीं हरा और अंत तक चढ़ने की कोशिस करता रहा उस को ऐसा करता देख मैं भी रुक सा गया और उसका प्रयास देखता रहा और एक वाक्या बन गया ।

हुआ यू की वो बंदा कुछ तकिया (पिलो) लिए हुआ था और उस घनी भीड़ में पहले उस पिलो को चढ़ाने की कोशिस कर रहा था और सफल हुआ पिलो चढ़ गया पर वो नहीं मेट्रो डोर बंद मेट्रो निकल गई। …… गई। ....... गई

धत तेरी की अब क्या होगा वैसे उसने लोगो को उस पिलो को अगले स्टॉप पर बाहर कर देने को कहा था पर पता नहीं डोर बंद होने के बाद लोगो ने उसकी वो आवाज सुनी भी हो गी  या नहीं और ये क्या अगली मेट्रो 6 मिनट बाद। ...................

मैं ने उसे सलाह दी की वो हेल्प सेंटर जाये और वहा इत्तला कर दे पर I don't know की उसने क्या किया उसे उसका सामान मिला भी या नहीं। ……

पर मैं मुस्कुराते हुए अपनी अगली मेट्रो पकड़ने को चल दिया।